क्या कायम रहेगी परंपरा या टूटेगा मिथक

रुड़की। विधानसभा चुनाव सम्पन्न हुए पांच दिन बीत चुके है। दस मार्च की शाम तक नतीजे आ जायगे। चुनाव को लेकर मंगलौर विधानसभा की बात की जाए तो 21 साल के इतिहास में यहां के चुनाव बड़े रोचक रहते आए है। लेकिन इस सीट का इतिहास रहा है कि जिस राजनैतिक दल का यहां विधायक बना उसकी राज्य में सरकार नही बन पाई। अब जबकि पांचवी विधानसभा के लिए चुनाव हो चुका है तो सियासी गलियारों इस बात को लेकर भी चर्चा जोरों शोरो से हो रही है कि पिछले 21 सालों से मंगलौर विधानसभा में क्या पुरानी परंपरा कायम रहेगी या फिर चला आ रहा मिथक टूटेगा।
चुनाव की बात की जाए तो हर जगह के अपने अपने कुछ मिथक होते है।मंगलौर विधानसभा सीट पर भी मिथक है।मिथक को तोड़ने के लिए सियासी दल और नेताओं के प्रयासों के बावजूद मिथक नही टूटते है।हालांकि राजनीति के जानकारों की माने तो यह एक संयोग है।साल 2000 में राज्य की स्थापना हुई और पहले सीएम भाजपा के नित्यानन्द स्वामी बने।उस समय मंगलौर सीट वजूद में नही थी बल्कि लक्सर विधानसभा का हिस्सा हुआ करता था।उस समय काजी मोहिउद्दीन यहां के विधायक थे जो काजी निजामुद्दीन के पिता थे।राज्य में पहले चुनाव से पूर्व विधानसभा सीटों का परिसीमन हुआ जिसमें मंगलौर विधानसभा सीट वजूद में आई।लेकिन 2002 से लेकर 2017 तक जो भी मंगलौर विधायक बना राज्य में उसके दल की सरकार नही बन पाई।राज्य में पहला चुनाव 2002 में हुआ तो मंगलौर विधानसभा सीट से बसपा प्रत्याशी के रूप में काजी निजामुद्दीन ने जीत हासिल की लेकिन राज्य में एनडी तिवारी की अगुवाई में कांग्रेस की सरकार बनी जिसके चलते मंगलौर विधायक को विपक्ष में बैठना पड़ा।साल 2007 में दूसरी विधानसभा के लिए चुनाव हुआ तो मंगलौर सीट बसपा टिकट पर फिर से काजी निजामुद्दीन निर्वाचित हुए लेकिन राज्य में भुवन चंद खंडूड़ी की अगुवाई में भाजपा की सरकार वजूद में आई।भले ही इन पांच सालों में कई सीएम बदले हो लेकिन काजी को विपक्ष में ही बैठना पड़ा।साल 2011 में काजी निजामुद्दीन बसपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए।और साल 2012 में एक बार फिर राज्य की तीसरी विधानसभा के चुनाव का बिगुल बजा। 2012 में भले ही राज्य में विजय बहुगुणा की अगुवाई कांग्रेस की सरकार बनी हो लेकिन कांग्रेस के काजी निजामुदीन को हार का सामना करना पड़ा ।इस चुनाव में बसपा के सरवत करीम अंसारी ने जीत हासिल की।ये मिथक यही नही रुका बल्कि लगातार जारी रहा।साल 2017 में चौथी विधानसभा के लिए चुनाव हुआ तो मंगलौर सीट से कांग्रेस टिकट पर काजी निजामुद्दीन ने जीत हासिल की लेकिन राज्य में कांग्रेस को बहुमत नही मिला और राज्य में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार त्रिवेंद्र सिंह रावत की अगुवाई में बनी जिसके चलते काजी निजामुद्दीन को फिर से विपक्ष में बैठना पड़ा। अब जबकि राज्य की पांचवी विधानसभा के लिए भी 14 फरवरी को मतदान हो चुका है और 10 मार्च की शाम तक चुनाव परिणाम भी सामने आ जायगे लेकिन सियासी गलियारों में यही सवाल हवा की तरह तैर रहा है कि मंगलौर विधानसभा में 21 सालों से चली आ रही परम्परा कायम रहेगी या इस बार मिथक टूटेगा।चुनाव परिणाम किया होगा ये तो अभी भविष्य के गर्भ में है लेकिन चले आ रहे मिथक को लेकर सियासी गलियारों में चर्चाओं दौर लगातार जारी है।कुछ लोगो का मानना है कि पिछले 21 सालों से चला आ रहा मिथक बरकरार रहेगा और जो भी यहां से जीतेगा उसे पूर्व की भांति विपक्ष में बैठना पड़ेगा जबकि कुछ लोगो का ये भी मानना है कि यह एक संयोग है और इस बार पहले से चली आ रही परंपरा टुटगे ही नही बल्कि मिथक भी टुटगे।बहरहाल मंगलौर विधानसभा सीट का मिथक टुटगे या परम्परा कायम रहेगी इसका पता दस मार्च को चुनावी परिणाम आने के साथ ही सामने आ जायेगा।





